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Wednesday, September 07, 2011

कल शाम मैं इक़बाल भाई से मिला


अजब शक्शियत हैं इक़बाल भाई भी. हिन्दू होते हुए भी मुसलमान सा नाम रखते हैं, मुफ़लिस होते हुए भी दिल बड़ा रखते हैं. कभी लन्दन में फ़ाकामस्ती, कभी कानपूर में जूते घिसाई, कभी हालीवुड की बेवेरली हिल्स के आलिशान बंगले में ऐश, कभी वहीँ के किसी होटल में वेटर की नौकरी, बड़ी दुनिया देखि है इक़बाल भाई ने.

उनसे किसी का दर्द सहा नहीं जाता, तभी तो चौथी मंज़िल से कूदी और साल भर तक प्लास्टर ऑफ़ पैरिस के सांचे में जकड़ी उस अनजान गोरी महिला से रोज़ एक घंटा निकाल कर मिलने जाते हैं. कभी अपना पेट काट कर किसी के लिए दवाई लाते हैं, तो कभी अपमान सहने के बाद भी किसी की दिली-तमन्ना पूरी करते हैं. पैसे से उन्हें कोई लगाव नहीं, झूठ बोलने से कतराते हैं, पर फिर भी गुरु-बाबा बन लोगों को रिझाते हैं!

अजब शख्स हैं इक़बाल भाई भी. मेरे अपने न होते हुए भी बेहद अपने नज़र आते हैं. कल शाम मैं उन्हीं इक़बाल भाई से मिला.
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इक़बाल भाई, कुर्रतुलें हैदर की कहानी 'कलंदर' के मुख्य किरदार हैं. कभी-कभी किसी किरदार से मिलकर ऐसा ही लगता है न कि सच में किसी शख्स से मिलें हो हम?

Monday, February 14, 2011

कहानियों की नगरी


बहुत बड़ा शहर है दिल्ली, और जितने लोग, उतनी कहानियां! अपनी रोजाना की ज़िन्दगी में तो हम एक set pattern follow करते हैं, सुबह घर से उठते हैं, काम पर जाते हैं, उन्ही पहले मिले-मिलाये लोगों से मिलते हैं, घर वापस आ जाते हैं. पर अगर थोडा सा दायरा बड़ा कर लें हम अपना, रुक कर रास्तें में अगर देखें आस-पास तो पाएंगे के चेहरों के भीतर कितनी कहानियां छुपी है इस शहर में.

कहानियों के इस शहर से चुन कर कुछ आधे-अधूरे व्यक्ति-चरित्र पेश करने की मेरी ये कोशिश उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आयेगी. किरदार बहुत हैं, और मैं कहानी के सूत्रधार की तरह सबसे जुड़ा रहूँगा, और हम सबको बांधे रहेगी ये महानायिका, मेरी, आपकी दिल्ली.

पहली कहानी - नानी

मेरी पहली कहानी एक बूढी नानी की है, जो दिल्ली के सैकड़ों मोहल्लों की हजारों दादी-नानियों की तरह बेनाम है. उन्हें सिर्फ अम्मा के नाम से जाना जाता है, रास्ते में दिखने पर पाँव छू लिए जाते हैं और फिर भुला दिया जाता है. sunday के दिन ऐसी ही एक नानी ने अपने घर से ऊपर वाली मंजिल में रहने वाले दो लड़कों से उनकी छत पर रहने की इजाज़त मांगी!

नानी की भाषा थोड़ी अबूझ है, वो दोनों सिर्फ इतना समझे के समधियाने से कुछ लोग उनके यहाँ रहने आ रहे हैं तो अपनी बेटी के घर रहने वाली वो नानी अपने ही घर में नहीं रह पायेगी. अब जब तक वो लोग बेटी के घर में रहेंगे, नानी छत पर अपनी खाट डाल के रहेगी, वहीँ अपना चूल्हा-चौका करेगी और अपने पंछियों को दाना डालेगी. बस सुबह नहाने-धोने के लिए वो उन दोनों लड़कों से उनका toilet इस्तेमाल करने की इजाज़त मांग रही थी. आपको क्या लगता है, मना कर पाएंगे वो नानी को?

नानी को अपने पंछियों से बड़ा प्यार है. रोह सुबह मूंह-अँधेरे उठ कर, छत पर दाना दाल कर आती है. और उन्ही पंछियों की वजह से छत पर रहना मंजूर है, पर किसी रिश्तेदार के यहाँ जाना नहीं! कहती है, जिस दिन मेरे पति की मौत हुयी थी, उस दिन भी मैं ऊपर पंछियों को दाना दाल कर आई थी और उनसे माफ़ी मांगी थी, "अब तो घर का खर्चा चलाने वाला चला गया, अब सेवा न कर पाऊँ तो माफ़ कर देना!"

ऐसी नानी को भला वो दोनों कैसे मना कर पाते?

dreamt before

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