Showing posts with label urdu. Show all posts
Showing posts with label urdu. Show all posts

Wednesday, September 07, 2011

कल शाम मैं इक़बाल भाई से मिला


अजब शक्शियत हैं इक़बाल भाई भी. हिन्दू होते हुए भी मुसलमान सा नाम रखते हैं, मुफ़लिस होते हुए भी दिल बड़ा रखते हैं. कभी लन्दन में फ़ाकामस्ती, कभी कानपूर में जूते घिसाई, कभी हालीवुड की बेवेरली हिल्स के आलिशान बंगले में ऐश, कभी वहीँ के किसी होटल में वेटर की नौकरी, बड़ी दुनिया देखि है इक़बाल भाई ने.

उनसे किसी का दर्द सहा नहीं जाता, तभी तो चौथी मंज़िल से कूदी और साल भर तक प्लास्टर ऑफ़ पैरिस के सांचे में जकड़ी उस अनजान गोरी महिला से रोज़ एक घंटा निकाल कर मिलने जाते हैं. कभी अपना पेट काट कर किसी के लिए दवाई लाते हैं, तो कभी अपमान सहने के बाद भी किसी की दिली-तमन्ना पूरी करते हैं. पैसे से उन्हें कोई लगाव नहीं, झूठ बोलने से कतराते हैं, पर फिर भी गुरु-बाबा बन लोगों को रिझाते हैं!

अजब शख्स हैं इक़बाल भाई भी. मेरे अपने न होते हुए भी बेहद अपने नज़र आते हैं. कल शाम मैं उन्हीं इक़बाल भाई से मिला.
...
...
...
इक़बाल भाई, कुर्रतुलें हैदर की कहानी 'कलंदर' के मुख्य किरदार हैं. कभी-कभी किसी किरदार से मिलकर ऐसा ही लगता है न कि सच में किसी शख्स से मिलें हो हम?

Monday, January 04, 2010

एक नज़्म उनके नाम

रहते हैं इन्ही दरीचों* में हम भी
जो तुम देखते हो, वही देखते हैं

ये गुमनाम सडकें, ये बेनाम चेहरे
क्या तुम देखते हो, जो ये देखते हैं

कहने को तो है, सिर्फ बुतपरस्ती** ये
क्या तुम देखते हो, क्या हम देखते हैं

छोड़े कारीगर ने, निशाँ ऐसे गहरे
जहाँ देखते हैं, उसे देखते हैं

ये कहना गलत है उनकी आँखें नहीं हैं
जो वो देखते हैं, हम देखते हैं

कहीं हैं ग़ज़ल, खूब तुमने भी ग़ालिब
जो हम देखते हैं, हमीं देखते हैं

खिली उनके चेहरे पर मुस्कान ऐसे
ज्यों गंगा के तट पर, दीये देखते हैं

दरीचे - windows; बुतपरस्ती - idol worship

year's first verse dedicated to the love of my life. can't promise that i'll be able to translate this, but try i'll sure. love you all. and yes, may the new year be full of beauty and bliss :)

dreamt before

Related Posts Widget for Blogs by LinkWithin