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Wednesday, August 10, 2011

रिश्ता


एक वक़्त था, जब पेंसिल रंग छोड़ती थी कागज़ पर
प्लास्टिक के बटन, आवाज़ तो करते हैं
पर रिश्तों की वो चुभन कहाँ

उँगलियाँ चलती हैं की-बोर्ड पर
नज़्म लेती जाती है रूप अपना
पर कुछ फ़ासला सा लगता है दरम्यान दोनों के

Saturday, August 06, 2011

पैगम्बर


चमकती तीरगी की बेरहमी
जब हद से बढ़ जाती है
चीखती खामोशियों की गर्मी
जब झुलसा देती है तहज़ीब के पनपते बीज
और कुछ कहने और सुनने को
बचता नहीं ख्याल की बंजर ज़मीन पर
...
तेरी रहमत का भेजा एक मासूम सा कतरा
जन्म लेता है इस वीरान कागज़ पर
और नज़्म कहलाता है

Monday, January 04, 2010

एक नज़्म उनके नाम

रहते हैं इन्ही दरीचों* में हम भी
जो तुम देखते हो, वही देखते हैं

ये गुमनाम सडकें, ये बेनाम चेहरे
क्या तुम देखते हो, जो ये देखते हैं

कहने को तो है, सिर्फ बुतपरस्ती** ये
क्या तुम देखते हो, क्या हम देखते हैं

छोड़े कारीगर ने, निशाँ ऐसे गहरे
जहाँ देखते हैं, उसे देखते हैं

ये कहना गलत है उनकी आँखें नहीं हैं
जो वो देखते हैं, हम देखते हैं

कहीं हैं ग़ज़ल, खूब तुमने भी ग़ालिब
जो हम देखते हैं, हमीं देखते हैं

खिली उनके चेहरे पर मुस्कान ऐसे
ज्यों गंगा के तट पर, दीये देखते हैं

दरीचे - windows; बुतपरस्ती - idol worship

year's first verse dedicated to the love of my life. can't promise that i'll be able to translate this, but try i'll sure. love you all. and yes, may the new year be full of beauty and bliss :)

dreamt before

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