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Tuesday, September 27, 2011

doosron ko itna padha, khud ko likhna bhoola main// दूसरों को इतना पढ़ा, खुद को लिखना भूला मैं


दूसरों को इतना पढ़ा, खुद को लिखना भूला मैं
कभी तो घर आऊँगा, सुबह का भटका-भूला मैं

doosron ko itna padha, khud ko likhna bhoola main
kabhi to ghar aaoonga, subah ka bhatka-bhoola main

दुनिया के इस मेले में, रोज़ नए दोस्त बनते हैं
कितनों को मैं याद नहीं, कितनों को हूँ भूला मैं

duniya ke is mele mein, roz naye dost bante hain
kitno ko main yaad nahi, kitno ko hoon bhoola mein

रोज़ सुबह अख़बार उठाकर, दुनिया को मैं जलता देखूं
खुद की छोटी चोट बड़ी है, दुनिया भर को भूला मैं

roz subah akhbar uthakar, duniya ko main jalta dekhoon
khud ki chhoti chot badi hai, duniya bhar ko bhoola main

30 बरस के इस जीवन में, अपनों ने कई ज़ख्म दिए
तेरे प्यार के मलहम से, हर उस ज़ख्म को भूला मैं

30 baras ke is jeevan mein, apno ne kayi zakhm diye
tere pyaar ke malham se, har us zakhm to bhoola main

बाहर बारिश झूम रही है, कोयल तितली बच्चे भी
बड़े बड़े 'टारगेट्स' के पीछे, छोटी खुशियाँ भूला मैं

bahar barish jhoom rahi hai, koyal title bacche bhi
bade bade 'targets' ke peeche, choti khushiyan bhoola main

तूने ही गम दिए हैं, तू ही देगा खुशियाँ भी
छोटी-मोटी तेरी भूलें, मौला सारी भूला मैं

toone hi gum diye hain, tu hi dega khushiyan bhi
choti-choti teri bhoolein, maula sari bhoola main

Wednesday, August 10, 2011

रिश्ता


एक वक़्त था, जब पेंसिल रंग छोड़ती थी कागज़ पर
प्लास्टिक के बटन, आवाज़ तो करते हैं
पर रिश्तों की वो चुभन कहाँ

उँगलियाँ चलती हैं की-बोर्ड पर
नज़्म लेती जाती है रूप अपना
पर कुछ फ़ासला सा लगता है दरम्यान दोनों के

Saturday, August 06, 2011

पैगम्बर


चमकती तीरगी की बेरहमी
जब हद से बढ़ जाती है
चीखती खामोशियों की गर्मी
जब झुलसा देती है तहज़ीब के पनपते बीज
और कुछ कहने और सुनने को
बचता नहीं ख्याल की बंजर ज़मीन पर
...
तेरी रहमत का भेजा एक मासूम सा कतरा
जन्म लेता है इस वीरान कागज़ पर
और नज़्म कहलाता है

Thursday, July 14, 2011

उठ मेरी जान तुझे लड़ना है अभी -मुंबई के लिए

उठ मेरी जान तुझे लड़ना है अभी
शहर के मक्तलों1 से उभरना है अभी

साँस रोके बैठी है हरेक रहगुज़र
उदास आँखों से बहता एक खामोश डर
संभल के चलना है, नहीं डरना है अभी
उठ मेरी जान तुझे लड़ना है अभी

ये तेरे रहनुमा, ये नुमाईंदे तेरे
कफ़न भेजेंगे खोखले लफ़्ज़ों के
इन्हीं ज़ख्मों को मलहम में बदलना है अभी
उठ मेरी जान तुझे लड़ना है अभी

इस से पहले के फिर से आदत हो जाये
फिर तू अख़बारों के पन्नों में खो जाये
'बस बहुत हुआ' का एलान करना है अभी
उठ मेरी जान तुझे लड़ना है अभी

खून सड़कों पर नहीं, रगों में बहे
ख़्वाब बिखरे नहीं, आँखों में रहें
गर बदलती नहीं दुनिया, तो बदलना है अभी
उठ मेरी जान तुझे लड़ना है अभी

(1 मक़तल: place of sacrifice, killing fields)

Thursday, June 16, 2011

सूरज चंदा जैसी जोड़ी हम दोनों


सूरज चंदा जैसी जोड़ी हम दोनों
दिन का राजा रात की रानी हम दोनों

जगमग जगमग दुनिया का मेला झूठा
सच्चा सोना, सच्ची चांदी हम दोनों

इक दूजे से मिलकर पूरे होते हैं
आधी-आधी एक कहानी हम दोनों

चारों ओर समंदर बढ़ती चिंता का
लहर लहर लहराती कश्ती हम दोनों

पर्वत-पर्वत, बादल-बादल, किरन-किरन
उजले पर वाले दो पंछी हम दोनों

मैं दहलीज़ का दीपक हूँ आ तेज़ हवा
रात गुजारें अपनी-अपनी हम दोनों

घर-घर दुःख-सुख का इक दीपक जले-बुझे
हर दीपक में तेल और बाती हम दोनों

दुनिया की ये माया कंकर-पत्थर है
आंसू-शबनम हीरा-मोती हम दोनों


-बशीर बद्र

Thursday, May 19, 2011

बस यही मेरी सज़ा, मेरा नसीब भी है


बस यही मेरी सज़ा, मेरा नसीब भी है
मेरा साया ही मेरा रकीब भी है

मुझे न समझाइये इबादत के मानी
वो ही दुआ मेरी, वो ही सलीब भी है

कुछ ऐसा रिश्ता रहा दरम्यान तेरे-मेरे
तू ही दूर सब से, तू ही करीब भी है

अजीब शख्स है, जो आईने से झांकता है
पूरा वहशी सही, थोड़ा अदीब भी है

हरेक लिहाज से तू बेहतर सही मुझसे
बिना मेरे, तू थोड़ा ग़रीब भी है

Wednesday, April 27, 2011

मौला

कैसी लिखी तक़दीर मौला
पानी पे खिंची लकीर मौला

हँसते-हँसते भूल गया वो
अश्कों की तासीर मौला

मुझ में, तुझ में, सब में वो है
गाता गया फ़कीर मौला

जितना बाँटू, बढ़ता जाये
दिल तो बड़ा अमीर मौला

26 बरस की सीधी गुड़िया
आँखें बड़ी शरीर मौला

अबके बरस वो मिल जाये मुझको
कर कुछ ये तदबीर मौला

Tuesday, July 27, 2010

अपने घर का

न रहा नामो-निशाँ अब अपने घर का
अजनबियों से पूछता हूँ, पता अपने घर का

इश्क ने मुझे दो जहाँ की दौलत वारी
आफ़ताब* अपने घर का, महताब** अपने घर का

अजब लोग इस शहर के, अजब आशनाई^
वक़्त पर न खोला किसी ने, दर अपने घर का

हर एक शख्स की चाहत अपनी, इबादत अपनी
शेख^^ अपने घर का, रिंद*^ अपने घर का

ज़मीन पैरों तले और आसमाँ ऊपर
बस यही है रक्ब^* अब अपने घर का

ये न समझे खुदा, के भूला हुआ हूँ मैं
मुझे पता है असली, पता अपने घर का

तुझसे मिला जब, महसूस हुआ मुझे
पूरा हुआ है ख्वाब, अब अपने घर का

*आफताब- सूरज, sun ; **महताब- चाँद, moon ; ^आशनाई- मेल-मिलाप, cordiality ; ^^शेख- धार्मिक व्यक्ति, religious individual ; *^रिंद- शराबी, drunkard; ^*रक्ब- क्षेत्रफल, area

Thursday, July 01, 2010

मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं

आँखों में नमी, होठों पर हंसी, मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं
यूं घुट-घुट कर जीते जाना, मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं

है वक़्त एक साया क़ातिल का, साथ मेरे जो चलता है
क़ातिल से करूँ मैं याराना, मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं

वो शोख हसीं जब नज़रें उठा, यूँ तीर निशाने पर छोड़े
दिल मेरे तेरा अब बच पाना, मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं

ये रंग बदलती दुनिया है, यहाँ रोज ही यार bichadte हैं
ऐसे में तेरा मुझे मिल जाना, मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं

कुछ अंजाना सा रिश्ता है, मेरे खुदा, तुझ में, मुझ में
इस रिश्ते को झुठला पाना, मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं

हम इश्क-तबीयत वाले लोग, कलम कहाँ साथ में रखते हैं
आहों से ग़ज़ल बुनते जाना, मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं
 
यहाँ मीठी सलाखें सपनों की, और दाना-पानी रिश्तों का
इस क़फ़स* से यूँ उड़ कर जाना, मुश्किल तो नहीं, आसाँ भी नहीं
*पिंजरा

dreamt before

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